बदसूरत लोमड़ी और मनमोहक खरगोश

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बदसूरत लोमड़ी और मनमोहक खरगोश

बदसूरत लोमड़ी और मनमोहक खरगोश की कहानी हिंदी में :- बहुत समय पहले की बात है एक मोहिनी नामक सुंदर वन था, वन में बहुत सारे जानवर रहा करते थे जिस कारण वन में शिकारी शिकार करने आया करते थे, परन्तु वन में विशेष रूप से शिकार का केन्द्र एक रघु नाम का मनमोहक और सुन्दर खरगोश था, जो वन में अन्य खरगोशों की तुलना में ज्यादा बड़ा, आकर्षित एवं समझदार था।

वन में बहुत सारे जानवर रघु के दोस्त थे, रघु के दोस्त हमेशा रघु की समझदारी तथा मनमोहक रूप की तारीफ किया करते थे जिस कारण वन में रहने वाले कुछ जानवर रघु से बहुत चिढ़ते थे।

वन में एक बहुत बदसूरत लोमड़ी भी रहती थी जिसका पूरा वन मजाक उड़ाया करता था। वन में सभी जानवर हमेशा लोमड़ी और रघु के रूप की तुलना करते थे, लोमड़ी को यह सब देखकर बहुत दुःख होता था।

एक दिन की बात है वन में एक समारोह का आयोजन किया गया जिसमें वन के सभी जानवरों को बुलाया गया। वन के सभी जानवरों में केवल बदसूरत लोमड़ी को नहीं बुलाया गया, बदसूरत लोमड़ी दूर से समारोह को देख रही थी तभी एक कबूतर बोला – “अरे बदसूरत लोमड़ी! तुम यहाँ क्यों आ गई? यहाँ बदसूरत लोमड़ी को किसी ने नहीं बुलाया है तुम यहाँ से चले जाओ।”

तभी खरगोश रघु बोला – “अरे कबूतर भाई! यह तुम क्या कर रहे हो ? किसी के रुप की वजह से उसका अपमान करना गलत है और यह वन जितना तुम्हारा और मेरा है उतना ही लोमड़ी बहन का भी है।” और रघु ने उस लोमड़ी से कहा – “लोमड़ी बहन आओ तुम भी हमारे समारोह में शामिल हो जाओ, यह वन का समारोह है और यह वन हम सबका है।”

यह सब सुनकर बदसूरत लोमड़ी बोली – “रघु तुम तो कुछ बोलो ही मत, मुझे पता है तुम को बहुत घमंड है कि तुम बहुत सुंदर खरगोश हो और तुम इतनी मीठी बातें केवल इन सब जानवरों के सामने अच्छा बनने के लिए कर रहे हो परन्तु रघु मैं तुम्हारी इन चिकनी-चुपड़ी बातों में नहीं आऊँगी और गुस्से में वहाँ से चली गयी”

यह सब देख कबूतर बोला – “देख लिया रघु, जितना लोमड़ी का रूप कुरूप है उतना ही लोमड़ी का मन भी कुरूप है, रघु तुम गलत ही बदसूरत लोमड़ी को हमारे समारोह में बुला रहे थे।”

रघु बोला – “नहीं कबूतर भाई, ऐसा नहीं है बेचारी लोमड़ी ने हमेशा अपना तिरस्कार ही देखा है इसलिए लोमड़ी को लगता है मुझे अपनी सुन्दरता पर घमंड है और मैं लोमड़ी का तिरस्कार करूँगा परंतु मैं ऐसा कभी सोच भी नहीं सकता” और यह कहकर रघु भी समारोह से चले जाता है और समारोह भी समाप्त हो जाता है।

बहुत समय बाद वह बदसूरत लोमड़ी वन में घूम रही थी और लोमड़ी रघु से बहुत ज्यादा गुस्सा थी, उसका गुस्सा इतना बढ़ गया कि बदसूरत लोमड़ी ने रघु को मारने के लिए योजना बनाई। लोमड़ी वन के शेर के लिए शिकार खोजा करती थी इसलिए शेर लोमड़ी को नहीं खाता था इसलिए लोमड़ी शेर के पास गई और बोली – “राजा की जय हो ! महाराज आप कैसे हैं?”

शेर बोला – “मैं तो ठीक हूँ परन्तु तू अब ठीक नहीं रहेगी, आज कितने दिनों से तू मेरे लिए कोई अच्छा शिकार नहीं लायी है।”

बदसूरत लोमड़ी डरते हुए बोली – “माफ़ी महाराज मैं आपके लिए ही शिकार की खोज कर रही थी और मैंने आपके लिए बहुत स्वादिष्ट शिकार ढूँढ लिया है।” यह सुनकर शेर बोला – “अच्छा बता फिर क्या है वह स्वादिष्ट शिकार ?”

लोमड़ी बोली – “महाराज वन में एक बहुत ही सुन्दर और स्वादिष्ट सा दिखने वाला रघु नाम का खरगोश है, आप उस खरगोश का शिकार कर लीजिए”

यह सुन शेर गुस्से में बोला – “खरगोश! खरगोश तो बहुत ही छोटे होते हैं और एक छोटे से खरगोश से मेरा क्या होगा? तुम एक तो इतने दिनों बाद मेरे लिए शिकार की खबर लाई हो और वह भी एक छोटे से खरगोश की, शायद आज तुमको ही मुझे अपना शिकार बनाना पड़ेगा।”

यह सुनकर डरते हुए बदसूरत लोमड़ी शेर से बोली – “महाराज वह खरगोश सामान्य खरगोश की तुलना में बहुत बड़ा है और वह आपका बहुत बड़ा शत्रु भी है इसलिए महाराज आपका उस खरगोश को मारना बहुत ही आवश्यक है।”

यह सब सुन शेर उस बदसूरत लोमड़ी से बोला – “वह खरगोश मेरा शिकार तो है पर मेरा बहुत बड़ा शत्रु कैसे है?”

लोमड़ी शेर से बोली – “महाराज, वह खरगोश अन्य खरगोशों से बड़ा, आकर्षक और समझदार है इसलिए मैंने सुना वन के सभी जानवर उस खरगोश को अपना नया राजा बनाने वाले हैं।”

शेर यह सुनकर गर्जन के साथ बोला – “क्या कहा ? इस वन के जानवरों की इतनी हिम्मत! जो उस छोटे से खरगोश रघु को अपना राजा बनाने के बारे में सोच रहे हैं। मैं उस खरगोश को अभी के अभी अपना शिकार बनाऊँगा” और शेर उस खरगोश की तलाश में वन में चले गया।

यह देखकर बदसूरत लोमड़ी बहुत खुश हो गई और रघु का शिकार होते देखने के लिए शेर के पीछे वन में चले गयी, जब बदसूरत लोमड़ी शेर के पीछे जा ही रही थी तभी लोमड़ी ने देखा कि वन में एक शिकारी भी आया है और बदसूरत लोमड़ी समझ गई कि संभवतः यह शिकारी भी हर शिकारी की तरह ही रघु की सुन्दरता के कारण रघु का ही शिकार करने वन में आया है।

यह देखकर लोमड़ी ने सोचा आज तो किसी भी तरह से रघु जीवित नहीं रहेगा, आज या तो शेर या यह शिकारी रघु का शिकार कर लेंगे और लोमड़ी मन ही मन बहुत खुश हुई।

कुछ देर बाद वन के बीच से शेर की गर्जना की आवाज आई, जिसे सुनकर वह बदसूरत लोमड़ी समझ गई कि शेर ने रघु को ढूँढ लिया है और वह शिकारी उस शेर की आवाज सुनकर उस शेर का शिकार करने के लिए शेर की गर्जना की तरफ चले गयी।

थोड़ी देर में लोमड़ी वहाँ पहुँची जहाँ से शेर के गरजने की आवाज आई थी, बदसूरत लोमड़ी ने देखा कि शेर अब रघु पर हमला करने वाला है और शेर जैसे ही खरगोश पर हमला करता है शेर की तरफ दो तीर आते हैं जिसमें से एक तीर शेर के हाथ में लगता है और शेर गिर जाता है जिस कारण रघु भाग जाता है।

रघु भागकर झाड़ियों में जाता है तो रघु देखता है कि शिकारी का दूसरा तीर लोमड़ी को लग गया है और रघु कहता है “लोमड़ी बहन! क्या तुम यहाँ मुझे शेर और शिकारी से सतर्क करने आई थी ?”

यह सुनकर बदसूरत लोमड़ी रोते हुए बोली – “रघु मुझे माफ कर दो, मुझे तुमसे बहुत ईर्ष्या हो गई थी तो मैंने शेर को तुम्हारे खिलाफ भड़काया और इसलिए आज शेर तुम्हारे शिकार के लिए आया” और यह कहते हुए बदसूरत लोमड़ी मर गई।

कहानी से शिक्षा

हमें इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि हमें किसी के लिए इतनी ईर्ष्या की अग्नि नहीं रखनी चाहिए कि उस ईर्ष्या की अग्नि में हम स्वयं को ही जला लें। किसी का बुरा कर हमारा कभी अच्छा नहीं हो सकता इसलिए किसी के लिए बुरा नहीं करना चाहिए।

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